भीख नहीं है आज़ादी…….

नई दिल्ली।

अप्रिय कंगना,

तुमसे इससे ज्यादा बुद्धिमत्ता की उम्मीद मैं कर भी नहीं सकता। विवादित बयान देना तुम्हारी फिल्मों के लिए अच्छा हो सकता है अतः तुम्हें अपनी अल्पबुद्धि की सीमा अनुसार अपने बयानों को भी विषय विशेष तक सीमित रखना चाहिए। आज़ादी को भीख कहकर तुमने उन असंख्य भारतवासियों का अपमान किया है जिन्होंने अपना जीवन ,यौवन, धन -दौलत सबकुछ देश की आज़ादी के लिए झोंक दिया। भीख के लिए कुर्बानियां नहीं देनी पड़ती, जेल नहीं जाना पड़ता, फाँसी नहीं चढ़नी पड़ती, विभाजन का दंश नहीं झेलना पड़ता, जलियांवाला बाग के जख्म सीने पर नहीं लेने पड़ते। आज़ादी के कुछ दशक बाद पैदा हुई हो, जन्म से आज़ादी मिली है, कम उम्र में स्टारडम मिल गया तो तुम क्या समझोगी गुलामी की पीड़ा को।

इतिहास पर टिप्पणी करने से पहले इतिहास को अच्छे से पढ़ लो, समझ लो। स्टार होने का यह अर्थ नहीं कि जो कहोगी स्वीकार्य होगा। ‘बड़ी ताकत के साथ बड़ी जिम्मेदारियां आती है'(साभार-फ़िल्म स्पाइडर मैन) मगर तुम्हारा ओहदा जैसे जैसे बढ़ता जा रहा है तुम गैरजिम्मेदार होती जा रही है। एक पद्म पुरस्कार विजेता द्वारा देश की आज़ादी को भीख कहना देश का व पद्म पुरस्कार का अपमान है। तुम्हें पाकर पद्म पुरस्कार मलिन हो गया आज।क्या कहा भगत सिंह को गांधी जी ने क्यों नहीं बचाया? थोड़ा भी विवेक होता और भगत सिंह को समझती तो ऐसा नहीं कहती।

भगत सिंह ने अपनी शहादत खुद चुनी थी, अपने साथियों के नाम उनका आखिरी संदेश ध्यान से पढ़ लो ट्वीट करने से पहले। भगत सिंह ने कहा कि यदि मैं मृत्यु के स्थान पर जीवन चुनता हूँ यो मेरा नाम मिट्टी में मिल जाएगा, जबकि मेरी शहादत मेरे जीवन को सार्थक बनाएगी क्योंकि इससे आजादी के आंदोलन में तेज़ी आएगी, लोग भगत सिंह बनने के लिये प्रेरित होंगे। जिसकी मृत्यु का उद्देश्य इतना महान हो उसकी मृत्यु टालकर गांधी जी भगत सिंह का ही अपमान करते। भगत सिंह स्वयं इतने समर्थ थे कि चाहते तो असेंबली से भागकर अपनी रक्षा कर लेते, मगर वे भागे क्यों नहीं, क्या उन्हें अपना अंजाम पता नहीं था…वे सब जानते थे, पूरी योजना के साथ उन्होंने शहीदी चुनी।

मगर आज़ादी को भीख कहने वाली तुम शहीदी क्या जानो, क्या जानो देश के लिए मर मिटना क्या होता है। भगत सिंह यदि हिंसा के समर्थक होते तो असेम्बली में खाली जगह पर बम फेंकने की बजाय जज या अंग्रेज ऑफिसर पर फेंकते। उन्हें भी पता चल गया है कि पहले लोगों को संगठित करना होगा छुटपुट हिंसक घटनाओं या कुछ अंग्रेजो की हत्या से आज़ादी नहीं आएगी। इसी उद्देश्य से उन्होंने ही उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिक दल का गठन किया ताकि लोगो को संगठित और जागरूक किया जा सके।जिस राष्ट्रपिता पर तुम टिप्पणी कर रही हो ना उसी महापुरुष के त्याग की वजह से तुमको अभिव्यक्ति को यह स्वतंत्रता मिल पायी है।

उसी ने देशवासियों में यह साहस भरा कि अपनी बात निर्भीकता से रख सके। जिस गांधी का तुम अपमान कर रही हो उसी की जन्मतिथि आज पूरा विश्व ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाता है, मार्टिन लूथर किंग उन्हें अपना आदर्श मानते है, उनसे कुछ देर की मुलाक़ात के बाद अल्बर्ट आइंस्टीन कहते है कि “आने वाली पीढियां शायद ही विश्वास करेंगी की धरती पर हाड़ मांस का चलता फिरता ऐसा इंसान हुआ करता था’ दुनिया मे राज करने वाली ब्रिटेन अपने संसद के आगे उनकी प्रतिमा लगाती है, पांच पर जिन्हें शांति के नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया और तुम्हें उनका तरीका भीख लगता है। तुम इतनी तो बुद्धिमान नहीं हो कंगना की मार्टिन लूथर किंग, अल्बर्ट आइन्स्टीन, नोबल समिति, ब्रिटेन की संसद, समस्त भारतवासी जिन्होंने उन्हें अपना राष्ट्रपिता माना उन सबके आगे तुम्हारे इस सड़े गले मानसिक विकार से ग्रस्त विचार को स्वीकार किया जाए।तुम अच्छी अभिनेत्री हो बस, बुद्धिजीवी होने का ढोंग बंद करो। वरना अभिनेत्री के रूप में जो सम्मान जनता की नज़रों में हासिल किया है वह भी समाप्त हो जाएगा। किसी पार्टी का समर्थन करो मगर उसके चक्कर में राष्ट्र की भावना को आहत करने वाले विचार व्यक्त मत करो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ कीचड़ उगलना नहीं है।

इतिहास की समझ नहीं रखती तो अपना मुंह बंद रखो। ना तो तुम्हें गया गांधी की समझ है ना भगतसिंह की। पढ़ा और समझा दोनों को नहीं है तुमने। और हाँ…तुम्हें पद्म पुरस्कार लौटा देना चाहिए क्योंकि यह पुरस्कार शर्मिंदा होगा तुम्हारे घर।एक राष्ट्रप्रेमी(जिसे यकीन है कि आजादी भीख में नहीं शहादतों के बाद मिली) ।

कमल यशवंत सिन्हा

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